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Vijay Marko
Sep 13, 2022
In CGPSC, VYAPAM, SSC Railway
Red blood cells (RBCs), also referred to as red cells, red blood corpuscles (in humans or other animals not having nucleus in red blood cells), haematids, erythroid cells or erythrocytes, are the most common type of blood cells and the vertebrate's principal means of delivering oxygen (O2) to the body tissues—via blood flow through the system. RBCs take up oxygen in the lungs, or in fish the gills, and release it into tissues while squeezing through the body's capillaries. The cytoplasm of a red blood cell is rich in haemoglobin, an iron -containing biomolecule that can bind oxygen and is responsible for the red color of the cells and the blood. In humans, mature red blood cells are flexible biconcave disks. They lack a cell nucleus and organelles, to accommodate maximum space for haemoglobin; they can be viewed as sacks of hemoglobin, with a plasm membrane as the sack. The cells develop in the bone marrow and circulate for about 100–120 days in the body before their components are recycled by macrophages Each circulation takes about 60 seconds (one minute). Approximately 84% of the cells in the human body are 20–30 trillion red blood cells. Nearly half of the blood's volume (40% to 50%) is red blood cells. Packed red blood cells (RBC) are red blood cells that have been donated, processed, and stored in a blood bank for blood transfusion. ( Bone marrow is a semi-solid tissue found within the spongy portions of bones. In birds and mammals, bone marrow is the primary site of new blood cell production. It is composed of hematopoietic cells, marrow adipose tissue, and supportive stromal cells.) Structure The vast majority of vertebrates, including mammals and humans, have red blood cells. Red blood cells are cells present in blood to transport oxygen. The only known vertebrates without red blood cells are the crocodile icefish (family Channichthyidae); they live in very oxygen-rich cold water and transport oxygen freely dissolved in their blood. While they no longer use haemoglobin, remnants of haemoglobin genes can be found in their genome Haemoglobin in the red blood cells also carries some of the waste product carbon dioxide back from the tissues; most waste carbon dioxide, however, is transported back to the pulmonary capillaries of the lungs as bicarbonate (HCO3−) dissolved in the blood plasma. myoglobin a compound related to haemoglobin, acts to store oxygen in muscle cells. Function The function of the circulatory system is as much about the transport of carbon dioxide as about the transport of oxygen. As stated elsewhere in this article, most of the carbon dioxide in the blood is in the form of bicarbonate ion. The bicarbonate provides a critical Ph buffer. Thus, unlike haemoglobin for O2 transport, there is a physiological advantage to not having a specific CO2 transporter molecule. Red blood cells, nevertheless, play a key role in the CO2 transport process, for two reasons. First, because, besides haemoglobin, they contain a large number of copies of the enzyme carbonic anhydrase on the inside of their cell membrane. Eating an iron-rich diet can increase your body's production of RBCs Iron-rich foods include: red meat, such as beef. organ meat, such as kidney and liver. dark, leafy, green vegetables, such as spinach and kale. dried fruits, such as prunes and raisins. beans. legumes. egg yolks. photo credit: quora
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Vijay Marko
Dec 23, 2021
In CGPSC, VYAPAM, SSC Railway
पोषण स्वास्थ्य एवं कल्याण का केंद्रीय बिंदु है। यह आपको काम करने के लिए शक्ति व उर्जा प्रदान करता हैं तथा तन्दुरुस्त एवं बेहतर महसूस करने में भी सहायता करता हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार पोषण का संबंध शरीर की आवश्यकतानुसार आहार के सेवन को माना जाता है। पोषण वर्तमान और सफल पीढ़ियों के जीवित रहने, स्वास्थ्य और विकास के लिए मुख्य मुद्दा है। हमारे शरीर को स्वास्थ्य रहने और बेहतर तरीके से काम करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पोषण जरूरत होती है । यह पोषण आपको वृहद तत्व पोषक ( Macronutrients) जैसे – वसा, कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से मिलता है जबकि सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) जैसे- विटामिन,मिनरल्स ऐनिया एसिड ऐसे भी आपको बेहतर सेहत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। शरीर को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व ना मिल पाना या जब शरीर जरूरी मात्रा में पोषक तत्व को सही तरीके से अवशोषित नहीं कर पाता तो ऐसे स्थिति को पोषण की कमी कहा जाता है पोषण की कमी से सेहत से जुड़ी कई तरह की समस्याएं और बीमारी हो सकती है जैसे – थकान ,एनीमिया मांसपेशियों में ऐंठन, हड्डियों में बेहद नाजुक या भंगुर होना, त्वचा से जुड़ी बीमारियां ,बाल झड़ना आदि है। देश के कई राज्यों में गरीबी के चलते लोगों को पर्यात मात्रा में भोजन नहीं मिल पाता। ऐसे परिवार में किसी गर्भवती महिला के साथ शिशु पर भी उसका असर होता है। आज देश में लगभग हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। देश की परिस्थितियों को देख कर सरकार ने पोषण संबंधित योजना शुरू किए हैं। जिसके माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाएगा और गरीब परिवारों तक पोषण से भरपूर पौष्टिक आहार पहुँचाया जायेगा व उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी जाँच की जायेगी। पोषण संबंधित कार्यक्रम NITI Aayog द्वारा तैयार एक प्लान बनाया गया है जिसमे 2022 तक “कुपोषित मुक्त भारत” या कुपोषण मुक्त भारत का लक्ष्य रखा गया है। केंद्र सरकार द्वारा देश के बच्चों को कुपोषण से मुक्त करने के लिए तमाम कोशिशें जारी की गयी है। कुपोषित मुक्त भारत का नाम सरकार ने बदल कर राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रम (Nutrition Programme) रख दिया गया है। हर साल 1 से 7 सितम्बर तक पोषण सप्ताह मनाया जाता है। राष्ट्रीय कुपोषण अभियान की शुरुवात 2018 में की गयी इसके अंतर्गत देश के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण संबंधी परिणामों को और अधिक सुधार करना है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण में बजट को लेकर साल 2020-21 और 2021-22 के लिए पोषण सामग्री परिणाम को और मजबूत करने के लिए पोषण कार्यक्रम और पोषण अभियान को मिलाने का फैसला किया है। नयी योजना को मिशन 2.0 का नाम दिया गया है। अपने दूसरे केंद्रीय बजट में financial year 2020-21 के लिए पोषण संबंधी कार्यक्रमों को और अधिक बढ़ावा देने के लिए 35,600 करोड़ देने का एलान किया है और साल 2021-22 के लिए आंगनवाड़ी और पोशन 2.0 का कुल बजट का अनुमान 20,105 करोड़ रुपये है। राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रम के अंतर्गत विभाग केंद्रों में पोषण अभियान चलाया जा रहा है जिसके माध्यम से महिलाओ, लड़कियों, बच्चों को खाने के आहार दिए जा रहे है जिससे उनके शारीरिक विकास में वृद्धि हो पाए। • आगनबाड़ी केंद्र के माध्यम से • प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना • आशा, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ,सामुदायिक केंद्रों में • सहायता समहू के माध्यम से राष्ट्रीय पोषण अभियान राष्ट्रीय पोषण मिशन का उद्देश्य National Nutrition Programmes का उद्देश्य देश के बच्चों को कुपोषण से मुक्त करना है। इस प्रोग्राम के माध्यम से लोगो को कुपोषण को लेकर जागरूक किया जा सकता है। इस मिशन द्वारा स्टंटिंग (सही तरह से विकसित नहीं हो पाना), अल्पपोषण (आधा पेट खाना खिलाना), एनीमिया (खून की कमी जो की छोटे बच्चों, महिलाओं और किशोर लड़कियों के बीच पायी जाती है), और कम वजन के बच्चों को अभियान के जरिये उनके विकास हेतु सहायता प्रदान करना ही इसका उद्देश्य है ताकि कोई भी बच्चा कुपोषण का शिकार न बने। इसके साथ प्रोग्राम के माध्यम से गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को मेडिकल समस्या के साथ मेडिकल सेंटर में भेजा जाता है, ताकि वह उनकी अच्छे से देखभाल की जा सके। योजना के मुख्य लाभ • राष्ट्रीय परिषद् में अब तक पोषण अभियान की 3 बैठक की जा चुकी है। जिसमे इन मुद्दों को मुख्य रूप से शामिल किया गया जिसके तहत कुपोषण को पूरी तरह मिटाया जा सके। • साल 2020 तक सभी राज्यों/ संग राज्यों क्षेत्रों और 718 जिलों को कुपोषण रहित बनाना। • 315 जिलों और 268 अतिरिक्त जिलों को पोषण अभियान हेतु जागरूक करना। • बच्चे के जन्म के पहले 1000 दिनों के दौरान किये जाने वाले रहत पैकेज को प्रदान करवाना राष्ट्रीय पोषण अभियान अंतर्गत सेवाएं आंगनबाड़ी सेवाएं आगनबाड़ी सेवाओं का उद्देश्य वह बच्चे जिनकी उम्र 0-6 साल, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओँ के स्वास्थ्य एवं सही पोषण में सुधार लाने का कार्य इसका लक्ष्य है। इस योजना द्वारा 6 तरह की सेवाएं उपलब्ध कराई गई है। जिनमे पूरी तरह से आहार प्रदान करना, अनौपचारिक शिक्षा (informative education),पोषाहार एवं स्वास्थ्य शिक्षा प्रदान करना, टीकाकरण, स्वास्थ्य सम्बन्धी जांच एवं रेफरल सेवाएं उपलब्ध की गयी है। कई तरह की खाने की चीजें इसके अंतर्गत लाभार्थियो को प्रति महीने दी जाती है। जिससे उनका शारीरिक विकास और अच्छे से हो पाए। आंगनबाडी से मिलने पौष्टिक आहार:- • गर्भवती महिला एवं धात्री महिलाओं को गेहूं सोया बर्फी, आटा ,लड्डू, खिचड़ी •6 महीने से 3 साल के बच्चों को हलुआ(प्रीमिक्स बाल आहार, खिचड़ी) •3 साल से 6 साल के बच्चे को मीठी लाप्सी, पौष्टिक खिचड़ी, नमकीन दलिया, उपमा, • 11 से 14 साल की किशोरी बालिका को गेहूं सोया बर्फी, खिचड़ी वर्तमान में चल रही राष्ट्रीय पोषण अभियान कार्यक्रम देश में कुपोषण को मिटाने के लिए सरकार द्वारा कई कार्यक्रम की शुरुवात की गयी है सभी कार्यक्रम की जानकारी लेख में नीचे दी जा रही है। • एकीकृत बाल विकास योजना(INTEGRATED CHILD DEVELOPMENT SCHEME): योजना के अन्तर्गत 6 साल के बच्चों, गर्भवती महिलाओ और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को स्वास्थ्य, पोषण एवं शैक्षणिक सेवाओं का एकीकृत राहत पैकेज प्रदान करना इसका उद्देश्य है। • विशेष पोषण कार्यक्रम(SPECIAL NUTRTION PROGRAMME): इसके अंतर्गत आने वाली आगनबाड़ी सेवाएं, प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना ,आशा, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक केन्द्रो, सहायता समहू के माध्यम से राष्ट्रीय पोषण अभियान चलाया जा रहा है जिसके माध्यम से महिलाओ, लड़कियों, बच्चों को खाने के आहार दिए जा रहे है। • मध्याह्न भोजन कार्यक्रम(MID DAY MEAL): मिड डे मील के अंतरगत वह बचे जो स्कूल पढ़ने पढ़ रहे है उन छात्रों को दोपहर के समय फ्री में भोजन कराना इसका उद्देश्य है जिससे कोई भी बचा भूखा न रहे। • राष्ट्रीय पोषण संबंधी एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम(NATIONAL NUTRITION ANAEMIA PROPHYLAXIS PROGRAMME): यह एक ऐसी इस्थिति है जिसमे व्यक्ति की लाल कोशिकाएं काम होती है और खून की मात्रा पूरे शरीर को नहीं मिल पाती और कई स्वास्थ्य समस्या पैदा होने लगती है। इसे ध्यान में रखते सरकार ने यह योजना का आरम्भ किया है। • गेहूं आधारित पोषण कार्यक्रम(WHEAT BASED NUTRITION PROGRAMME): बाल विकास मंत्रायल द्वारा इस योजना के अंतर्गत जिन बच्चों की आयु 0 से 6 साल तक है और जो महिलाएं गर्भवती/स्तनपान कराने वाली है उन्हें को पौष्टिक/ऊर्जायुक्त(energy) भोजन प्रदान करना इसका लक्ष्य है। • बलवाड़ी पोषण कार्यक्रम(BALWADI NUTRITION PROGRAMME): जिसे किंडरगार्टन कहा जाता है इसका एक मात्र उद्देश्य यह है की बच्चों का शारीरिक तथा मानसिक विकास और अच्छे से हो सके। • विटामिन ए की कमी के कारण दृष्टिहीनता की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम(NATIONAL PROGRAM FOR PREVENTION OF BLINDNESS DUE TO VITAMIN A DEFICIENCY): योजना के अंतर्गत कई तरह की सुविधाएं शामिल की गयी है. बच्चों को खसरा का टीका के साथ नौ महीने में 100000 आईयू इंजेक्शन की एक ख़ुराक। डीपीटी(diphtheria, pertussis, Tetanus) बूस्टर टीका के साथ16 से 18 महीने में 200000 आईयू इंजेक्शन की खुराक । पांच वर्ष की उम्र तक हर छह महीने में 200000 आईयू इंजेक्शन लगाया जाता है। • नेशनल गोइटर कंट्रोल प्रोग्राम(NATIONAL GOITER CONTROL PROGRAM): यह आज देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। देश में 167 मिलियन लोगों को आयोडीन की कमी से होने का खतरा रहता है। हलाकि इसे ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन इसे बढ़ने से रोका जा सकता है। • अनुप्रयुक्त पोषण कार्यक्रम(APPLIED NUTRTION PROGRAMME): सभी बच्चों, गर्भवती महिलाओ, एवं किशोरियों का मानसिक व शारीरिक संतुलन बनाये रखने के लिए देश में इन कार्यकर्मो की शुरुवात की गयी है जिससे देश में कुपोषण शिकार होने से बच सके इसके अंतर्गत कई तरह के जागरूक कार्यक्रम, पोषण सम्बन्धी बाते, खान पान सम्बंधित जानकारियों को बताया जा रहा है। 35 प्रतिशत बच्चे जिनकी उम्र 0-5 साल के बीच भारत में कुपोषित पाए जाते है। बिहार और उत्तर प्रदेश इन मामलो में सबसे आगे पाया गया है। जिसके बाद झारखण्ड, मेघालय और मध्य प्रदेश में बच्चे कुपोषण का शिकार पाए गए है।
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Vijay Marko
Dec 23, 2021
In CGPSC, VYAPAM, SSC Railway
भारत में दहेज प्रथा को रोकने के लिए 1 मई 1961 को अधिनियमित दहेज निषेध अधिनियम लागू किया गया था। इस अधिनियम के तहत देश में दहेज देना या लेना सख्त वर्जित है। यह भारत में दहेज से संबंधित पहला राष्ट्रीय कानून है। हालांकि बाद के वर्षों में यह कानून इस व्यवस्था को रोकने में अप्रभावी साबित हुआ। भारतीय संसद ने 1984 में इस कानून में और संशोधन किया। यह कानून भारतीय महिलाओं को दहेज की मांग के कारण होने वाली घरेलू हिंसा से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है । दहेज निषेध अधिनियम कानून, जिसका उद्देश्य दहेज देने या लेने करने से रोकना तथा होने वाले अत्याचार को रोकना है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, से जुड़ी प्रमुख धाराएं :- धारा 2 दहेज का मतलब है कोई सम्पति या बहुमूल्य प्रतिभूति देना या देने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से (क) विवाह के एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को (ख) विवाह के किसी पक्षकार के अविभावक या दूसरे व्यक्ति द्वारा विवाह के किसी पक्षकार को विवाह के समय या पहले या बाद देने या देने के लिए सहमत होना। लेकिन जिन पर मुस्लिम विधि लागू होती है उनके संबंध में महर दहेज में शामिल नहीं होगा। धारा 3 में दहेज देने और लेने की सजा का वर्णन है, जो कम से कम पांच साल की कारावास और 15,000 रुपये का जुर्माना या दहेज का मूल्य, जो भी अधिक हो, शामिल हैं। लेकिन शादी के समय वर या वधू को जो उपहार दिया जाएगा और उसे नियमानुसार सूची में अंकित किया जाएगा वह दहेज की परिभाषा से बाहर होगा। धारा 4 इसके अंतर्गत वर पक्ष अथवा वधू पक्ष के किसी भी व्यक्ति द्वारा (माता,पिता या रिश्तेदार) दहेज की मांग करने के लिए दंड का प्रावधान किया गया है तो उन्हें कम से कम 6 माह से अधिकतम 2 वर्ष के कारावास की सजा और ₹10000 तक जुर्माना हो सकता है। धारा 4 A - इसके अंतर्गत विवाद के संदर्भ में अपनी संपत्ति आर्थिक स्थिति के लिए विज्ञापन करने पर दंड का प्रावधान है 6 माह से अधिकतम 5 वर्ष का कारावास की सजा तथा ₹15000 तक जुर्माना हो सकता है। धारा 6 इसके तहत यदि कोई दहेज विवाहिता के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति द्वारा धारण किया जाता है तो दहेज प्राप्त करने के 3 माह के भीतर या औरत के नाबालिक होने की स्थिति में उसके बालिग होने के 1 वर्ष के भीतर उसे अंतरित कर देगा यदि महिला की मृत्यु हो गई हो और संतान नहीं हो तो अभिभावक को दहेज अंतरण किया जाएगा और यदि संतान है तो संतान को दहेज अंतरण किया जाएगा धारा 8 A इसके तहत यदि घटना से 1 वर्ष के भीतर शिकायत की गई हो तो न्यायालय पुलिस रिपोर्ट या क्षुब्ध द्वारा शिकायत किए जाने पर अपराध का संज्ञान ले सकेगा। धारा 8 B दहेज निषेध पदाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाएगी जो बनाये गये नियमों का अनुपालन कराने या दहेज की मांग के लिए उकसाने या लेने से रोकने या अपराध कारित करने से संबंधित साक्ष्य जुटाने का कार्य करेगा। दहेज से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धाराएं · धारा 406 यदि किसी स्त्री द्वारा उसका स्त्री धन वापस मांगा जाता है और देने से मना कर दिया जाए तो 3 वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है। · धारा 498 A इस धारा के अनुसार किसी स्त्री को उसकी पति या रिश्तेदार द्वारा शारीरिक उत्पीड़न अन्य मानसिक उत्पीड़न कियां जाता है तो उसके लिए बाध्य दंड संहिता में 3 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। · धारा 304 B यदि किसी विवाहित स्त्री की विवाह में 7 वर्ष तक किसी अज्ञात कारण से मृत्यु हो जाती है और उनके अभिभावक को यह लगे कि मृत्यु का कारण ससुराल पक्ष है तो उसके लिए ससुराल पक्ष को जिम्मेदार माना जाता है। इस प्रकार के अपराध की सजा भारतीय दंड संहिता के अनुसार कम से कम 7 वर्ष तथा अधिकतम आजीवन हो सकती है। ऐसी परिस्थितियां होती हैं जहां एक विवाहित महिला को उत्पीड़न और क्रूरता का शिकार होना पड़ता है, जिसे अपराध माना जाता है जैसे:- 1.दहेज हत्या धारा 304 (बी), भारतीय दंड संहिता, 1980 भारत में दहेज हत्या से संबंधित है। अगर किसी महिला की मौत शादी के सात साल के भीतर शारीरिक चोट लगने, जलने या अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई है और यह साबित हो जाता है कि उसे पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है, इसके तहत आता है। दहेज के संबंध में अपराधी को न्यूनतम सात वर्ष की कैद और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। 2.पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा एक महिला के प्रति क्रूरता भारतीय दंड संहिता, 1980 की धारा 498 (ए) एक महिला के साथ उसके पति या पति के रिश्तेदारों या दोनों द्वारा क्रूरता और उत्पीड़न से संबंधित है। धारा के तहत यह कारावास से दंडनीय है, जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इस धारा में क्रूरता के तहत शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की प्रताड़ना शामिल होती है। कोई भी रवैया जो जानबूझकर किसी महिला को आत्महत्या करने के लिए उकसाता हो या उसके जीवन, उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य और उसके अंग को खतरे में डालता हो, या दहेज, जैसे धन, सामान या संपत्ति के रूप में अवैध रूप से मांग कर मजबूर करता हो, इसके अंतर्गत आता है। 3.महिला की जानबूझकर मौत यदि कोई व्यक्ति दहेज के संबंध में किसी महिला की जानबूझकर मौत का कारण बनता है तो वह भारतीय दंड संहिता, 1980 की धारा 302 के तहत दंडनीय है 4.महिला को आत्महत्या के लिए उकसाना भारतीय दंड संहिता, 1980 की धारा 306 के तहत महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला आता है और जहां एक महिला का पति और पति के रिश्तेदार ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं जो एक महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करती हैं। अगर शादी के सात साल के भीतर ऐसा होता है तो इसे दहेज के लिए आत्महत्या के लिए उकसाना माना जाएगा। दहेज प्रथा के कारण 1. शिक्षा एवं सामाजिक प्रतिष्ठा-वर्तमान समय में शिक्षा एवं व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का अधिक महत्व होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति अपनी कन्या का विवाह शिक्षित एवं प्रतिष्ठित लड़के के साथ करना चाहता है जिसके लिए उसके काफी दहेज देना होता है क्योंकि ऐसे लड़कों की समाज में कमी पायी जाती है। 2. धन का महत्व-वर्तमान में धन का महत्व बढ़ गया है और इसके द्वारा व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा निर्धारित होती है। जिस व्यक्ति को अधिक दहेज प्राप्त होता है, उसकी प्रतिष्ठा भी बढ़ जाती है। यही नहीं, बल्कि अधिक दहेज देने वाले व्यक्ति की भी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। 3. प्रदर्शन एवं झूठी प्रतिष्ठा-अपनी प्रतिष्ठा एवं शान का प्रदर्शन करने के लिए भी लोग अधिकाधिक दहेज लेते एवं देते हैं। 4. सामाजिक प्रथा-दहेज का प्रचलन समाज में एक सामाजिक प्रथा के रूप में ही पाया जाता है। जो व्यक्ति अपनी कन्या के लिए दहेज देता है वह अपने पुत्र के लिए भी दहेज प्राप्त करना चाहता है। 5. दुष्चक्र (Vicious circle)- दहेज एक दुष्कक्र है जिन लोगों ने अपनी लड़कियों के लिए दहेज दिया है वे भी अवसर आने पर अपने लड़कों के लिए दहेज प्राप्त करना चाहते हैं। इसी प्रकार से लड़के के लिए दहेज प्राप्त करके वे अपनी लड़कियों के विवाह के लिए देने के लिए उसे सुरक्षित रखना चाहते हैं। दहेज प्रथा के दुष्परिणाम दहेज प्रथा के परिणामस्वरूप समाज में अनेक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, इनमें से प्रमुख प्रकार हैं- 1. बालिका वध-दहेज की अधिक मांग होने के कारण कई व्यक्ति कन्या को पैदा होते ही मार डालते हैं। इसका प्रचलन राजस्थान में विशेष रूप से रहा है, किन्तु वर्तमान में यह प्रथा प्राय: समाप्त हो चुकी है। 2. पारिवारिक विघटन-कम दहेज देने पर कन्या को ससुराल में अनेक प्रकार के कष्ट दिये जाते हैं। दोनों परिवारों में तनाव एवं संघर्ष पैदा होते हैं और पति-पत्नी का सुखी वैवाहिक जीवन उजड़ जाता है। 3. हत्या एवं आत्महत्या-जिन लड़कियों को अधिक दहेज नहीं दिया जाता उनको ससुराल में अधिक सम्मान नहीं होता, उन्हें कई प्रकार से तंग किया जाता है। इस स्थिति से मुक्ति पाने के लिए बाध्य होकर कुछ लड़कियाँ आत्महत्या तक कर लेती हैं। दहेज के अभाव में कन्या का देर तक विवाह न होने पर उसे सामाजिक निन्दा का पात्र बनना पड़ता है, ऐसी स्थिति में भी कभी-कभी लड़की आत्महत्या कर लेती है। 4. ऋणग्रस्तता-दहेज देने के लिए कन्या के पिता को रुपया उधार लेना पड़ता है या अपनी जमीन एवं जेवरात, मकान आदि को गिरवीं रखना पड़ता है या बेचना पड़ता है परिणामस्वरूप परिवार )णग्रस्त हो जाता है। ब्याज की ऊंची दर के कारण उधार लिया हुआ रुपया चुकाना कठिन हो जाता है। अधिक कन्याएं होने पर तो आर्थिक दशा और भी बिगड़ जाती है। 5. निम्न जीवन-स्तर-कन्या के लिए दहेज जुटाने के लिए परिवार को अपनी आवश्यकताओं में कटौती करनी पड़ती है। बचत करने के चक्कर में परिवार का जीवन-स्तर गिर जाता है। 6. बहुपत्नी विवाह-दहेज प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति कई विवाह करता है इससे बहुपत्नीत्व का प्रचलन बढ़ता है। 7. बेमेल विवाह-दहेज के अभाव में कन्या का विवाह अशिक्षित, वृद्ध, कुरूप, अपंग एवं अयोग्य व्यक्ति के साथ भी करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में कन्या को जीवन भर कष्ट उठाना पड़ता है। 8. विवाह की समाप्ति-दहेज के अभाव में कई लोग अपने वैवाहिक सम्बन्ध कन्या पक्ष से समाप्त कर देते हैं। कई बार तो दहेज के अभाव में तोरण द्वार से बारात वापस लौट जाती है और कुछ लड़कियों को कुंआरी ही रहना पड़ता है।
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Vijay Marko
Nov 27, 2021
In CGPSC, VYAPAM, SSC Railway
1. संघ का नाम और राज्यक्षेत्र – (1) भारत, अथार्त् India, राज्यों का संघ होगा (2) राज्य और उनके राज्यक्षेत्र वे होंगे जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं भारत के राज्यक्षेत्र में (क) राज्य के राज्यक्षेत्र, 2 (ख) पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट संघ,राज्यक्षेत्र, और (ग) ऐसे अन्य राज्यक्षेत्र जो अर्जित किए जाएं, समाविष्ट होंगे ।
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Vijay Marko

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